पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कैश कांड में लोकसभा की तीन सदस्यीय जांच समिति की अंतिम रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश कर दी गई है। रिपोर्ट में समिति ने लगाए गए तीनों आरोपों पर उन्हें पूरी तरह दोषी माना है। मामला मार्च 2025 में दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास के स्टोर रूम में आग लगने के बाद कथित तौर पर बड़ी मात्रा में ₹500 के नोट मिलने से सामने आया था।
14 मार्च 2025 की रात नई दिल्ली स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास के स्टोर रूम यानी आउटहाउस में अचानक आग लग गई। आग बुझाने के लिए जब दमकलकर्मी मौके पर पहुंचे तो मलबे के बीच ₹500 के नोटों के भारी बंडल दिखाई दिए। रिपोर्ट के मुताबिक, नोटों के बंडल करीब डेढ़ फीट ऊंचे ढेर के रूप में वहां बिखरे हुए थे।
घटना सामने आने के बाद यह मामला तेजी से न्यायपालिका और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने मामले की जांच के लिए आंतरिक समिति गठित की। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया।
समिति की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाले पैनल ने की और मामले से जुड़े तथ्यों, बयानों तथा उपलब्ध साक्ष्यों की जांच की गई।
तीनों आरोपों में समिति ने माना दोषी
संसद में पेश अंतिम रिपोर्ट के मुताबिक समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को पूरी तरह साबित माना है।
सबसे बड़ा सवाल यह था कि सरकारी आवास के स्टोर रूम में इतनी बड़ी मात्रा में नकदी आखिर किसकी थी, वह वहां कहां से आई और सरकारी परिसर में उसे क्यों रखा गया था।
समिति के सामने जस्टिस वर्मा इस नकदी के स्रोत और उसके स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में असफल रहे।
रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया कि नकदी मिलने के बाद उससे जुड़े संभावित साक्ष्यों को सुरक्षित और सील करने के लिए जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए गए।
सीलिंग से पहले बदली गई स्टोर रूम की स्थिति?
जांच समिति के अनुसार, स्टोर रूम की सीलिंग और साक्ष्यों को सुरक्षित करने की कार्रवाई शुरू होने से ठीक पहले वहां की स्थिति में बदलाव किया गया था। बाद में कुछ करेंसी नोटों के गायब होने की बात भी सामने आई।
समिति ने माना कि परिसर के प्रभारी होने के नाते जस्टिस वर्मा पर उपलब्ध साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी थी और उन्होंने इस संबंध में आवश्यक सावधानी नहीं बरती।
हालांकि, रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण अंतर भी स्पष्ट किया गया है। समिति को ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि स्वयं जस्टिस वर्मा स्टोर रूम में गए और उन्होंने वहां से नकदी हटाई।
यानी समिति ने सबूतों की सुरक्षा को लेकर उनकी जिम्मेदारी पर सवाल उठाया, लेकिन सीधे तौर पर नकदी हटाने का कृत्य उनके द्वारा किए जाने का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं पाया।
बदले बयान और 'साजिश' वाली दलील पर भी सवाल
जांच के दौरान जस्टिस वर्मा की ओर से दी गई सफाई भी समिति के निशाने पर रही।
विशेष रूप से 22 मार्च को दिए गए जवाब सहित उनके अलग-अलग बयानों में समिति ने विरोधाभास पाए। रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआत में उन्होंने नकदी की मौजूदगी से पूरी तरह इनकार किया। बाद में उन्होंने इस पूरे मामले को उन्हें फंसाने की साजिश अथवा नकदी को वहां प्लांट किए जाने की संभावना से जोड़ दिया।
लेकिन समिति ने उनके इस रुख को 'Evasive' यानी टालने वाला बताया।
समिति का कहना था कि उनके बयान स्वतंत्र गवाहों के बयानों और उपलब्ध अन्य साक्ष्यों से मेल नहीं खाते थे। यही विरोधाभास जांच के दौरान उनके पक्ष की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल बन गया।
अप्रैल 2026 में दे दिया था इस्तीफा
विवाद बढ़ने के बीच जस्टिस यशवंत वर्मा ने अप्रैल 2026 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। जांच के अंतिम चरण में उन्होंने खुद को कार्यवाही से अलग कर लिया और समिति के समक्ष गवाहों की सूची भी पेश नहीं की।
इसके बावजूद समिति ने उपलब्ध रिकॉर्ड, बयानों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अपनी जांच पूरी की और अंतिम रिपोर्ट संसद को सौंप दी।
सुप्रीम कोर्ट में FIR और SIT की मांग भी पहुंची थी
मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में एफआईआर दर्ज कराने और अदालत की निगरानी में एसआईटी जांच कराने की मांग भी उठी थी। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि मामला पहले से ही संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया के दायरे में है।
अब लोकसभा की जांच समिति की अंतिम रिपोर्ट संसद के पटल पर आ चुकी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस रिपोर्ट के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आगे की कानूनी और आपराधिक कार्रवाई किस दिशा में बढ़ती है।
फिलहाल रिपोर्ट ने न्यायपालिका की जवाबदेही, सरकारी आवास में साक्ष्यों की सुरक्षा और न्यायिक पदों पर बैठे लोगों के आचरण को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है।
निष्कर्ष:
एक तरफ समिति ने तीनों आरोपों में जस्टिस वर्मा को दोषी माना है, वहीं दूसरी तरफ रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उनके द्वारा स्वयं नकदी हटाए जाने का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला। अब संसद में रिपोर्ट पेश होने के बाद आगे की संवैधानिक, कानूनी और आपराधिक प्रक्रिया पर देश की निगाहें टिकी हैं।
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