संसद का मानसून सत्र गुरुवार को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। पूरे सत्र में विपक्ष के हंगामे और विरोध के कारण कामकाज प्रभावित रहा और करीब 12 विधेयक बिना विस्तृत चर्चा के पारित हुए। सरकार ने कांग्रेस पर सदन को जानबूझकर बाधित करने का आरोप लगाया, जबकि विपक्ष ने सरकार से अहम मुद्दों पर जवाब मांगा। सवाल यह है कि क्या संसद में विरोध की यह शैली लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर कर रही है?
संसद का मानसून सत्र गुरुवार को लोकसभा की कार्यवाही शुरू होने के कुछ ही मिनट बाद अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। इसके साथ ही संसद का पूरा मानसून सत्र समाप्त हो गया। लेकिन सत्र के खत्म होने के साथ एक सवाल और ज्यादा बड़ा होकर सामने आया है—क्या सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव अब संसद की कार्यवाही से भी बड़ा हो गया है?
पूरे सत्र के दौरान विपक्ष के हंगामे और विरोध के कारण सदन की कार्यवाही लगातार प्रभावित हुई। कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो सकी। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, लोकसभा में करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा में लगभग 39 प्रतिशत ही कामकाज हो पाया। इसी दौरान करीब 12 विधेयक बिना विस्तृत चर्चा के पारित होने को लेकर भी सवाल उठे।
विपक्ष का सरकार के खिलाफ विरोध करना भारतीय संसदीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है। संसद में नारेबाजी, वेल में आना, कार्यवाही रोकना और सरकार पर दबाव बनाना पहले भी विपक्ष की रणनीति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन इस बार विवाद इस बात को लेकर है कि क्या विरोध का तरीका संसदीय बहस की सीमा से आगे निकल गया?
संसद में हंगामा पहली बार नहीं हुआ
भारतीय संसदीय इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं, जब विपक्ष के विरोध के कारण संसद की कार्यवाही लगभग ठप रही। हालांकि, ऐसे उदाहरणों में अक्सर किसी बड़े राजनीतिक या नीतिगत विवाद ने केंद्र की भूमिका निभाई थी।
2014 से पहले केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी और भाजपा प्रमुख विपक्षी दल के रूप में सरकार को घेरती थी। भाजपा ने भी कई बार संसद की कार्यवाही बाधित की, लेकिन उस समय 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन और कोयला ब्लॉक आवंटन जैसे गंभीर आरोप बड़े मुद्दे थे।
इन मामलों में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की रिपोर्ट और जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बाद सरकार से जवाबदेही की मांग तेज हुई थी। विपक्ष इन मामलों की जांच और सरकार से जवाब मांगने के लिए संसद में लगातार दबाव बनाता रहा।
2010 का शीतकालीन सत्र बना बड़ा उदाहरण
2010 का शीतकालीन सत्र संसद में गतिरोध के सबसे चर्चित उदाहरणों में शामिल है। उस समय भाजपा के नेतृत्व में विपक्ष 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC गठित करने की मांग कर रहा था।
तत्कालीन यूपीए सरकार इस मांग को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। इसके बाद सदन में लगातार गतिरोध बना रहा। स्थिति इतनी गंभीर हुई कि लोकसभा की उत्पादकता छह प्रतिशत से भी नीचे चली गई और लगभग पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया।
2012 में कोयला आवंटन पर टकराव
2012 के मानसून सत्र में कोयला ब्लॉक आवंटन बड़ा मुद्दा बना। CAG की रिपोर्ट में आवंटन को लेकर सवाल उठाए गए थे। विपक्ष ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफे की मांग तक कर दी।
दोनों सदनों में लगातार विरोध हुआ और लोकसभा अपनी निर्धारित अवधि के करीब 20 प्रतिशत समय में ही काम कर सकी।
2018 में भी संसद का कामकाज बुरी तरह प्रभावित
2018 का बजट सत्र भी हंगामे के कारण चर्चा में रहा। नीरव मोदी और पंजाब नेशनल बैंक घोटाला, आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा और अविश्वास प्रस्ताव जैसे मुद्दों पर अलग-अलग दलों ने विरोध किया।
इस दौरान सत्र की उत्पादकता करीब चार प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जिसे लंबे समय में सबसे कम उत्पादक बजट सत्रों में गिना गया।
यानी इतिहास यह बताता है कि संसद में हंगामा नया नहीं है। विपक्ष ने पहले भी सरकार को घेरा है और सदन की कार्यवाही बाधित की है। फर्क इस बात पर है कि विरोध के पीछे मुद्दा क्या था और उसे संसद के भीतर किस तरह आगे बढ़ाया गया।
इस बार मानसून सत्र में क्या हुआ?
मौजूदा मानसून सत्र में विपक्ष ने कई मुद्दे उठाए। शुरुआत में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की ओर से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग प्रमुख रही।
विपक्ष चाहता था कि कुछ अहम मुद्दों पर गृह मंत्री सदन में जवाब दें। सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने राहुल गांधी से मुलाकात कर सदन चलने देने की अपील भी की।
सरकार ने कई मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार होने की बात कही। लेकिन विपक्ष और सरकार के बीच सहमति बनने के बजाय गतिरोध बना रहा। आलोचकों का कहना है कि जब चर्चा और मंत्री के जवाब की मांग से आगे बढ़कर इस्तीफे की मांग सामने आती है, तो विरोध की रणनीति को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यहीं से कांग्रेस और विपक्ष की रणनीति पर राजनीतिक बहस तेज हुई।
सरकार का आरोप—विपक्ष बहस से भाग रहा
संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने मानसून सत्र के कामकाज को लेकर विपक्ष, खासकर कांग्रेस, पर गंभीर आरोप लगाए।
उन्होंने कहा कि लोकसभा में केवल 19 प्रतिशत काम हुआ, जबकि राज्यसभा में करीब 39 प्रतिशत कामकाज हो पाया। रिजिजू ने कहा कि सरकार संसद में चर्चा के स्तर से खुश नहीं है।
उनका आरोप है कि कांग्रेस ने अनुचित तरीके से सदन की कार्यवाही बाधित की और संसदीय व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की।
रिजिजू के मुताबिक संसद का चलना बेहद जरूरी है, क्योंकि संसद चलेगी तभी बहस होगी और देशहित में निर्णय लिए जा सकेंगे। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि विपक्ष का काम केवल नारेबाजी करना नहीं, बल्कि बहस में हिस्सा लेना और सरकार को जवाबदेह बनाना भी है।
लेकिन सवाल विपक्ष के लिए भी उतना ही बड़ा है
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का संवैधानिक और राजनीतिक दायित्व है। सरकार को घेरना, गलत नीतियों पर सवाल उठाना और जनता की आवाज सदन में उठाना विपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका है।
लेकिन संसद केवल विरोध का मंच नहीं है। यह वह जगह है जहां कानून बनते हैं, नीतियों पर चर्चा होती है और जनता के प्रतिनिधि देश के भविष्य से जुड़े फैसलों पर बहस करते हैं।
इसलिए सवाल यह नहीं कि विपक्ष को विरोध करना चाहिए या नहीं।
सवाल यह है कि क्या हर बड़े राजनीतिक टकराव का अंतिम रास्ता सदन को ठप करना ही होना चाहिए?
अगर विरोध की राजनीति इतनी लंबी हो जाए कि विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित होने लगें, संसदीय समितियों और बहस की भूमिका कमजोर हो और जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा का समय ही न बचे, तो नुकसान केवल सरकार या विपक्ष का नहीं होता।
नुकसान उस जनता का होता है, जिसने अपने प्रतिनिधियों को संसद में भेजा है।
मानसून सत्र अब समाप्त हो चुका है, लेकिन सरकार और विपक्ष के बीच यह टकराव आने वाले सत्रों में भी जारी रहने के संकेत दे रहा है।
संसद में सरकार मजबूत हो या विपक्ष आक्रामक—लोकतंत्र की असली ताकत अंततः बहस, जवाबदेही और निर्णय की प्रक्रिया में है।
अब देखना यही होगा कि अगले सत्र में राजनीतिक दल इस टकराव से क्या सीख लेते हैं—क्या संसद फिर से बहस और संवाद का मंच बनेगी, या नारेबाजी और हंगामा ही संसदीय राजनीति की नई परंपरा बनता जाएगा?
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