Friday, July 31, 2026

लखनऊ की दवा मंडी में मौत का कारोबार! फर्जी बिलिंग, नकली इंजेक्शन और करोड़ों के सिंडिकेट का पर्दाफाश

अमीनाबाद से रायबरेली तक फैले नेटवर्क का खुलासा, पांच फर्मों के खिलाफ एफआईआर दर्ज, बिना लाइसेंस के गोदाम में मिलीं संदिग्ध दवाएं।

New Delhi , Latest Updated On - Jul 30 2026 | 17:34:00 PM
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लखनऊ के अमीनाबाद मेडिसिन मार्केट से पूरे प्रदेश में नकली और अधोमानक दवाओं की आपूर्ति किए जाने के मामले ने स्वास्थ्य विभाग और पुलिस प्रशासन को अलर्ट कर दिया है। एफएसडीए की छापेमारी में फर्जी बिलिंग, अवैध भंडारण और कोल्ड चेन नियमों के उल्लंघन का बड़ा खुलासा हुआ है।

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न केवल स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि आम लोगों की जान के साथ खिलवाड़ करने वाले एक बड़े नेटवर्क की भी पोल खोल दी है। अमीनाबाद मेडिसिन मार्केट से पूरे प्रदेश में नकली और संदिग्ध दवाओं की आपूर्ति किए जाने का खुलासा होने के बाद प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है।

खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) की टीम ने कई दिनों तक चली छापेमारी के बाद इस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि फर्जी बिलों के जरिए दवाओं की खरीद-बिक्री की जा रही थी और बाजार में ऐसी दवाएं भेजी जा रही थीं, जिनकी गुणवत्ता संदिग्ध थी।

पांच फर्मों के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा

औषधि निरीक्षक विवेक कुमार सिंह की शिकायत पर अमीनाबाद थाने में पांच फर्मों और उनके संचालकों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। इनमें मिश्रा एसोसिएट्स, मिश्रा मेडिकल एजेंसी, श्री अशोक फार्मास्यूटिकल्स, भारत फार्मा और एमडीएच फार्मा शामिल हैं।

पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की तह तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि आखिर प्रदेश के किन-किन जिलों में इन दवाओं की आपूर्ति की गई थी और कितने लोग इससे प्रभावित हुए हैं।

फर्जी बिलिंग के जरिए चल रहा था पूरा खेल

जांच के दौरान सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि मशहूर एंटीबायोटिक दवा "ऑगमेंटिन डुओ-625" की करीब 3200 स्ट्रिप्स की खरीद-बिक्री फर्जी बिलों के जरिए की गई थी।

जांच में पाया गया कि जिस दवा की वास्तविक कीमत लगभग 116.70 रुपये प्रति यूनिट थी, उसे केवल 56.60 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदा और बेचा जा रहा था। इस अंतर ने अधिकारियों को पूरे मामले की गहराई से जांच करने के लिए मजबूर कर दिया।

बिना लाइसेंस के चल रहा था गोदाम

एफएसडीए की टीम ने जब अमीनाबाद स्थित मिश्रा एसोसिएट्स के सामने बने गोदाम की जांच की तो वहां भारी मात्रा में दवाएं बरामद हुईं। सबसे हैरानी की बात यह रही कि इस गोदाम के पास औषधि भंडारण का कोई वैध लाइसेंस ही नहीं था।

अधिकारियों के मुताबिक, यहां बड़ी मात्रा में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन भी रखे गए थे। यह इंजेक्शन अत्यंत संवेदनशील श्रेणी में आता है और इसे दो से आठ डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखना अनिवार्य होता है।

लेकिन जांच के दौरान यह इंजेक्शन किसी रेफ्रिजरेटर में नहीं, बल्कि साधारण थर्मोकोल के बक्सों में रखा हुआ मिला। इससे दवा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

पांच दवाओं के नमूने जांच के लिए भेजे गए

एफएसडीए की टीम ने मौके से पांच अलग-अलग दवाओं के नमूने एकत्र किए हैं। इन नमूनों को प्रयोगशाला में भेज दिया गया है। रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट हो पाएगा कि दवाएं नकली थीं या उनकी गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी।

जांच एजेंसियों ने एहतियात के तौर पर पूरे गोदाम को सील कर दिया है।

बंद मिलीं दोनों फर्में

एफएसडीए की टीम जब भारत फार्मा और एमडीएच फार्मा पहुंची तो दोनों प्रतिष्ठान बंद मिले। दुकानें खुलवाने के बाद अधिकारियों को वहां बेहद कम मात्रा में दवाएं मिलीं।

एमडीएच फार्मा में तो दवाओं की जगह घरेलू सामान और क्रॉकरी रखी हुई थी। अधिकारियों को वहां न तो दवाओं का स्टॉक मिला और न ही खरीद-बिक्री से संबंधित कोई दस्तावेज मिले।

जांच में सामने आया देवेन्द्र शुक्ला का नाम

इस मामले में एक नाम सबसे अधिक चर्चा में है और वह है देवेन्द्र शुक्ला का। जांच के दौरान कई फर्मों के संचालकों ने दावा किया कि दवाओं की खरीद-बिक्री और वित्तीय लेन-देन से जुड़े अधिकांश काम देवेन्द्र शुक्ला ही संभालता था।

मिश्रा एसोसिएट्स के संचालक मनीष मिश्रा ने भी अपने बयान में देवेन्द्र शुक्ला और राहुल नामक व्यक्ति की भूमिका का जिक्र किया है। विभाग को ऐसे कई बिल भी मिले हैं, जिन पर देवेन्द्र शुक्ला के हस्ताक्षर मौजूद हैं।

हालांकि, जांच टीम जब इन लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, तब उनके मोबाइल फोन लगातार बंद मिल रहे हैं।

जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि नकली और अधोमानक दवाएं केवल आर्थिक अपराध नहीं हैं, बल्कि यह सीधे तौर पर लोगों के जीवन से जुड़ा हुआ मामला है। गलत तरीके से संग्रहीत या नकली दवाओं के इस्तेमाल से मरीजों की जान तक जा सकती है।

इसी वजह से स्वास्थ्य विभाग इस मामले को बेहद गंभीरता से ले रहा है। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि आखिर इस नेटवर्क का दायरा कितना बड़ा है और इसके पीछे कौन-कौन लोग शामिल हैं।

फिलहाल लखनऊ के अमीनाबाद से शुरू हुई इस जांच ने पूरे प्रदेश में दवा कारोबार की पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

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