उत्तर प्रदेश की लोक और जनजातीय संस्कृति को नई पहचान दिलाने तथा विलुप्त होती परंपराओं को संरक्षित करने की दिशा में संस्कृति विभाग ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। लखनऊ स्थित संस्कृति निदेशालय में आयोजित उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान की सामान्य परिषद की बैठक में आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 के कार्यक्रमों और कार्ययोजना को मंजूरी प्रदान की गई। बैठक में प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, लोक कलाकारों के उत्थान, पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण और जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई अहम निर्णय लिए गए।
संस्कृति निदेशालय के सभागार में आयोजित इस बैठक की अध्यक्षता संस्कृति विभाग की विशेष सचिव श्रीमती दीपा रंजन ने की। बैठक में प्रदेश के अनेक वरिष्ठ अधिकारियों, सांस्कृतिक विशेषज्ञों और संस्थानों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
बैठक में भारतेन्दु नाट्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. रति शंकर त्रिपाठी, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष प्रो. जयन्त खोत, संस्कृति निदेशालय के सहायक निदेशक डॉ. राजेश अहिरवार, राज्य संग्रहालय के निदेशक डॉ. विनय कुमार सिंह, डॉ. कुमुद सिंह, श्री नरेन्द्र पाठक, श्री जगप्रसाद तिवारी, श्री सुरेश प्रसाद कुशवाहा, डॉ. बृजभान मरावी, सुश्री तारा चौधरी, डॉ. मनोज कुमार मिश्रा, श्री राम विनय, संस्थान के कोषाध्यक्ष श्री धर्मेन्द्र यादव तथा संस्थान के निदेशक श्री अतुल द्विवेदी सहित परिषद के सभी सदस्य मौजूद रहे।
2026-27 की कार्ययोजना को मिली मंजूरी
बैठक में वित्तीय वर्ष 2026-27 के प्रस्तावित कार्यक्रमों और योजनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई। परिषद के सदस्यों ने विभिन्न प्रस्तावों की समीक्षा करने के बाद उन्हें स्वीकृति प्रदान की।
बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि प्रदेश के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में मौजूद लोक कला और संस्कृति को संरक्षित करने के लिए प्रभावी रणनीति तैयार की जाए। इसके अलावा संसाधनों के बेहतर उपयोग, वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने पर भी बल दिया गया।
लोक कलाकारों को मिलेगा प्रोत्साहन
बैठक के दौरान लोक कलाकारों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों, शोध परियोजनाओं और प्रकाशन योजनाओं पर भी विचार-विमर्श किया गया। परिषद के सदस्यों ने सुझाव दिया कि ग्रामीण क्षेत्रों में छिपी हुई प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं।
इसके साथ ही युवा पीढ़ी को लोक संस्कृति से जोड़ने के लिए कार्यशालाओं, सांस्कृतिक शिविरों और प्रदर्शनियों के आयोजन की योजना भी बनाई गई।

विशेष सचिव श्रीमती दीपा रंजन ने बैठक के दौरान कहा कि उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान उसकी विविध लोक परंपराओं और जनजातीय विरासत में निहित है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि पारंपरिक हस्तशिल्प, लोक व्यंजन, लोक चिकित्सा पद्धतियों और अन्य विलुप्तप्राय सांस्कृतिक धरोहरों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाए।
उन्होंने कहा कि केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इन परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है।
जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने की पहल
बैठक में इस बात पर भी सहमति बनी कि जनजातीय समुदायों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे। परिषद के सदस्यों ने सुझाव दिया कि इन समुदायों की पारंपरिक कला और संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए।
संस्कृति विभाग के संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर
बैठक के दौरान यह निर्णय लिया गया कि संस्कृति विभाग के अधीन संचालित सभी संस्थानों, अकादमियों और अन्य संगठनों के बीच समन्वय स्थापित किया जाएगा, ताकि संयुक्त रूप से सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊर्जा मिलेगी और लोक कलाकारों को अधिक अवसर प्राप्त होंगे।
शोध और प्रकाशन कार्यों को मिलेगा बढ़ावा
बैठक में सांस्कृतिक शोध कार्यों और प्रकाशन गतिविधियों को बढ़ावा देने का भी निर्णय लिया गया। इसके तहत विभिन्न लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों और जनजातीय जीवन शैली से संबंधित जानकारियों का संग्रह और प्रकाशन किया जाएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम न केवल सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करेगा, बल्कि शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी साबित होगा।
अंत में व्यक्त किया गया आभार
बैठक के समापन पर संस्थान के निदेशक श्री अतुल द्विवेदी ने सभी सदस्यों और अधिकारियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि परिषद की ओर से दिए गए सुझावों को समयबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा, ताकि प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को और अधिक समृद्ध बनाया जा सके।
COMMENTS