ग्राम भनौता के खसरा नंबर 386 में कथित अवैध कॉलोनाइजेशन और विला निर्माण को लेकर GNIDA वर्क सर्किल-2 की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। “फोर्स नहीं मिल रही” के जवाब के बीच SM प्रदीप कुमार से कार्रवाई को लेकर कई सवाल हैं।
ग्राम भनौता के खसरा नंबर 386 में कथित अवैध कॉलोनाइजेशन और लगातार हो रहे विला निर्माण ने GNIDA के वर्क सर्किल-2 की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मौके पर निर्माण लगातार आगे बढ़ने की बात सामने आ रही है।
सवाल यह है कि जब खसरा नंबर 386 में एक के बाद एक विला तैयार हो रहे हैं, तो वर्क सर्किल-2 की कार्रवाई आखिर कहां है?
इस पूरे मामले में सवाल सीधे तौर पर SM प्रदीप कुमार से भी जुड़े हैं। हमारी टीम जब भी कार्रवाई को लेकर सवाल करती है तो कथित तौर पर एक ही रटारटाया जवाब सामने आता है—“फोर्स नहीं मिल रही है।”
लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह जवाब कब तक चलेगा?
अगर पुलिस बल नहीं मिल रहा है तो क्या उसे उपलब्ध कराने के लिए संबंधित अधिकारियों से लगातार समन्वय किया गया? क्या लिखित रूप से पुलिस फोर्स मांगी गई? क्या उच्च अधिकारियों को इसकी जानकारी दी गई? और अगर फोर्स मांगने के बावजूद नहीं मिल रही, तो उसकी आधिकारिक वजह क्या है?
क्योंकि “फोर्स नहीं मिल रही” कहना एक स्थिति हो सकती है, लेकिन क्या यह कार्रवाई न होने का पर्याप्त और स्थायी कारण भी हो सकता है?
मामला यहीं खत्म नहीं होता।
कथित तौर पर यह भी कहा जाता है कि मौके पर जाने पर अधिकारियों के साथ बदसलूकी होती है और अधिकारी अपनी बेइज्जती कराने के लिए मौके पर नहीं जाएंगे। लेकिन सवाल यह है कि अगर किसी सरकारी अधिकारी के साथ बदसलूकी होती है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कौन करेगा? पुलिस और प्रशासन से सहयोग लेकर अधिकारी मौके पर क्यों नहीं जा सकते?
अगर अधिकारी ही यह कहकर पीछे हट जाएं कि “हम अपनी बेइज्जती कराने नहीं जाएंगे”, तो फिर कथित अवैध निर्माण रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?
और अगर जवाब यह हो कि “पूरे शहर में भूमाफिया फैल गया है, हम क्या कर सकते हैं?”, तो सवाल और गंभीर है। जिस क्षेत्र की जिम्मेदारी वर्क सर्किल-2 को दी गई है, वहां नियमों का पालन सुनिश्चित करना आखिर किसकी जिम्मेदारी है?
सबसे चौंकाने वाली बात तब होगी अगर कोई जिम्मेदार अधिकारी यह सोचकर काम करे कि “कुछ महीने ही रिटायरमेंट में बचे हैं, बिना किसी झमेले के कट जाने दीजिए।” क्या सरकारी पद पर बैठकर इस तरह की मानसिकता उचित है? क्या सरकारी वेतन सिर्फ समय काटने के लिए मिलता है, या उसके साथ जनता के प्रति जवाबदेही और कर्तव्य भी जुड़ा है?
GNIDA जैसी महत्वपूर्ण संस्था में इतने महत्वपूर्ण वर्क सर्किल की जिम्मेदारी ऐसे रवैये के साथ निभाई जा सकती है या नहीं, यह सवाल GNIDA के उच्च अधिकारियों को भी देखना चाहिए।
और अब एक सवाल, जिसे स्थानीय स्तर पर उठ रही चर्चाओं के संदर्भ में पूछना जरूरी है—कहीं कार्रवाई न होने की कोई और वजह तो नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि SM साहब तक भी “प्रसाद” पहुंच चुका हो, जिसकी वजह से भूमाफिया रूपी आकाओं पर कार्रवाई नहीं हो रही? इसका जवाब संबंधित अधिकारी से लिया जाना चाहिए।
हालांकि, Bharat News 360 TV इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता है और संबंधित अधिकारी का पक्ष इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण है।
लेकिन खसरा नंबर 386 में निर्माण रुक नहीं रहा।
इसलिए GNIDA को स्पष्ट करना चाहिए—
अब तक कितनी कार्रवाई हुई?
पुलिस फोर्स की मांग कब और किससे की गई?
और यदि फोर्स नहीं मिली तो वैकल्पिक कदम क्या उठाए गए?
SM प्रदीप कुमार साहब, सवाल सीधा है—“फोर्स नहीं मिल रही” का रटारटाया जवाब आखिर कब तक चलेगा?
क्योंकि खसरा नंबर 386 में विला बनते जा रहे हैं और जनता जवाब का इंतजार कर रही है।
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