उत्तर प्रदेश में मिट्टी की उर्वरता तेजी से घट रही है। कृषि निदेशक ने किसानों से हरी खाद अपनाने का आग्रह किया है, जिससे न केवल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम होगी।
उत्तर प्रदेश की कृषि व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती उभरकर सामने आ रही है—मिट्टी की गिरती सेहत। इस संकट को लेकर प्रदेश के कृषि निदेशक डॉ. पंकज त्रिपाठी ने किसानों को सतर्क करते हुए हरी खाद के उपयोग को बढ़ावा देने का आह्वान किया है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में कृषि उत्पादन पर व्यापक असर पड़ सकता है।
डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, फसलों से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए मिट्टी में जीवांश कार्बन की पर्याप्त मात्रा होना बेहद आवश्यक है। लेकिन वर्तमान स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि प्रदेश की अधिकांश कृषि भूमि में जीवांश कार्बन का स्तर घटकर केवल 0.2 से 0.3 प्रतिशत तक रह गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसे कम से कम 0.8 से 1 प्रतिशत तक बढ़ाना जरूरी है, तभी मिट्टी अपनी उत्पादक क्षमता को बनाए रख सकेगी।

मिट्टी की इस खराब होती स्थिति के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। सबसे प्रमुख कारण है रासायनिक उर्वरकों जैसे यूरिया और डी.ए.पी. का अत्यधिक उपयोग। इसके अलावा, गर्मी के मौसम में खेतों की जुताई न करना भी एक बड़ा कारण बन रहा है। इन दोनों कारणों से मिट्टी में रहने वाले लाभकारी कीट और केंचुए धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। ये जीव मिट्टी की संरचना और उर्वरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके खत्म होने से न केवल मिट्टी कमजोर होती है, बल्कि फसलों की उत्पादकता भी प्रभावित होती है और उर्वरकों की मांग लगातार बढ़ती जाती है।
इस समस्या का समाधान बताते हुए डॉ. त्रिपाठी ने हरी खाद को एक प्रभावी विकल्प बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दलहनी और गैर-दलहनी फसलों को उनकी वानस्पतिक वृद्धि के दौरान मिट्टी में दबाना ही हरी खाद कहलाता है। इसके लिए किसान ढैंचा, सनई, लोबिया, ग्वार और मक्का जैसी फसलों का उपयोग कर सकते हैं। ये फसलें विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनकी जड़ों में मौजूद जीवाणु वातावरण से नाइट्रोजन को अवशोषित कर मिट्टी में स्थिर करते हैं, जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है।
कृषि निदेशक ने किसानों को सलाह दी है कि वे वर्ष में कम से कम एक बार इन फसलों की बुवाई करें और 30 से 40 दिनों के भीतर इन्हें मिट्टी में पलट दें। इस प्रक्रिया से मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है, साथ ही सूक्ष्म जीवों की सक्रियता भी बढ़ती है। इसका सीधा लाभ यह होता है कि मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि होती है।

विशेष रूप से अप्रैल और मई की भीषण गर्मी के दौरान हरी खाद की फसलें खेतों को ढककर रखने में सहायक होती हैं। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और ऊसरपन (बंजर होने की प्रक्रिया) बढ़ने की संभावना कम हो जाती है। साथ ही, यह प्रक्रिया आगामी फसलों के लिए भूमि को बेहतर तरीके से तैयार करती है।
किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए कृषि विभाग भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। विभाग द्वारा ढैंचा और मिश्रित हरी खाद के बीज के पैकेट 50 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराने की योजना बनाई जा रही है। इच्छुक किसान कृषि विभाग के पोर्टल पर पंजीकरण कर इन बीजों को प्राप्त कर सकते हैं। यह पहल न केवल किसानों की लागत को कम करेगी, बल्कि उन्हें आधुनिक और टिकाऊ खेती की ओर भी प्रेरित करेगी।
हरी खाद के उपयोग से किसानों को कई स्तरों पर लाभ मिलेगा। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी, जिससे खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी। इसके अलावा, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होने से लंबे समय तक स्थायी उत्पादन सुनिश्चित किया जा सकेगा।
कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि यदि किसान हरी खाद जैसी पारंपरिक और वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाते हैं, तो वे न केवल अपनी भूमि की सेहत को सुधार सकते हैं, बल्कि कृषि को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बना सकते हैं। अब देखना यह है कि किसान इस अपील को कितनी गंभीरता से लेते हैं और आने वाले समय में इसका कितना व्यापक असर देखने को मिलता है।
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